निजीकरण भारत के लिए खतरनाक - मधेपुरा खबर Madhepura Khabar

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5 मार्च 2020

निजीकरण भारत के लिए खतरनाक

मधेपुरा
भारत को सन् 1947 में स्वतंत्रता मिली. उस दौरान दुनिया में मुख्य रूप से दो तरह की अर्थव्यवस्थाएँ चल रही थीं. अमेरिका आदि देश पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के समर्थक थे, जबकि सोवियत संघ के नेतृत्व में साम्यवादी व्यवस्था चल रही थी.
                       भारत ने इन दोनों व्यवस्थाओं को मिलाकर मिश्रित अर्थव्यवस्था को स्वीकार किया. यह बात पूर्व प्रधानाचार्य सह पूर्व सिंडीकेट सदस्य डाॅ. परमानंद यादव ने कही. वे गुरूवार को ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय के बीबीए विभाग में आयोजित एक दिवसीय सेमिनार में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे. सेमिनार का विषय पब्लिक सेक्टर का निजीकरण, नई कर-प्रणाली और आर्थिक विकास था.
                             उन्होंने कहा कि भारतीय नेताओं ने यह सोचा कि मूलभूत चीजें पब्लिक सेक्टर में रहें और इनका संचालन सरकारी नियंत्रण में हो. इसलिए रक्षा, रेलवे आदि को पब्लिक सेक्टर में रखा गया. उन्होंने बताया कि प्राइवेट सेक्टर में कोई एक व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह मालिक होता है. यहाँ प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और श्रमिकों का शोषण अधिक होता है.

                         कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रधानाचार्य डॉ. के. पी. यादव ने कहा कि महाविद्यालय लगातार प्रगति पथ पर अग्रसर है. यहाँ नियमित रूप से शैक्षणिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि बीबीए एक जाॅब ओरिएंटेड कोर्स है. इसका बहुत डिमांड है. आज हर कंपनी को अच्छे प्रोफेशनल्स की जरूरत है. सिंडीकेट सदस्य डाॅ. जवाहर पासवान ने कहा कि निजीकरण की नीतियां वंचित वर्ग के खिलाफ हैं और इसका देश पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है.
                           भारत को एक इस्ट इंडिया कंपनी ने गुलाम बना लिया था. अब तो सैकड़ों विदेशी कंपनियां आ गई हैं, ऐसे में देश पर गुलामी का खतरा बढ़ता जा रहा है. उन्होंने कहा कि सरकारी कंपनियों का निजीकरण नहीं होना चाहिए. भारत सरकार द्वारा रेलवे आदि सार्वजनिक क्षेत्र का निजीकरण करने का प्रयास, देश के लिए खतरनाक है. उन्होंने निजी क्षेत्र में भी आरक्षण लागू करने और नई कर प्रणाली को वापस लेने की माँग की.
                     बीबीए विभाग के समन्वयक डाॅ. मनोज कुमार यादव ने कहा कि भारत में नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रित्व काल में निजीकरण की नीति को स्वीकार किया गया और तब मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे. आज दे निजीकरण की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है. रेलवे का भी निजीकरण किया जा रहा हैै. कुछ रूट पर निजी ट्रेन चल रही हैं.
                            जनसंपर्क पदाधिकारी डाॅ. सुधांशु शेखर ने कहा कि भूमंडलीकरण, निजीकरण एवं उदारीकरण की नीतियां भारत जैसे विकासशील देशों के लिए अत्यधिक नुकसानदेह है. उन्होंने कहा कि निजीकरण की नीतियों ने गरीबीे, बेरोजगारी एवं विषमता को बढ़ावा दिया है. इसके कारण गाँव-समाज उजड़ रहा है, खेती-किसानी एवं लघु-कुटीर उद्योग बंद हो रहे हैं और देश की अर्थव्यवस्था को गहरा आघात पहुंचा है.
                   इस अवसर पर राष्ट्रीय सेवा योजना की कार्यक्रम पदाधिकारी डाॅ. विजया कुमारी, दीपक कुमार राणा, ए. के. भारती, रीत कुमार, मनोज कुमार, मो. अब्दुर रहमान, राकेश कुमार, रूपेश कुमार, ऐश्वर्या भवानी, अदिति राज, साक्षी श्रेया, सोनल शर्मा, निशि भारती, दिव्यांशी, अंजली कुमारी, सुबलेश पंडित, इफ्तेखार मीर, आकाश आनंद, सोनू कुमार, कुंदन कुमार रजक, सोनू कुमार, सूरज कुमार, हिमांशु कुमार, फैयाज, आनंद कुमार झा, रौशन कुमार आदि उपस्थित थे.
(रिपोर्ट:- ईमेल) 

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