मधेपुरा: कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के समय भूखमरी की समस्या भी बढ़ रही है. 135 करोड़ वाले देश भारत में भी यह तेजी से बढ रही हैं. देश की GDP का माईनस 23.9 होना. यह हमारे अर्थव्यवस्था कि स्थिति को गंभीर रूप से दर्शाता है, जो कि कोरोना से पहले ही इतनी कमजोर थी.इस वायरस के साथ ही कई प्रकार की समस्यायें और भी व्यापक होती जा रही हैं. विश्व खाद्य कार्यक्रम का अनुमान है पेट भर भोजन नहीं पाने वाले की संख्या 2020 में बढकर 26.5 करोड़ हो सकती है, जो 2019 में 13.5 करोड़ थी.
आर्थिक विकास में सर्वागीण विकास का होना जरूरी है. लोगों को संतुलित भोजन की इतनी मात्रा मिले कि वे कुपोषण के दायरे से बाहर निकल कर एक स्वस्थ जीवन जी सकें. हालांकि कि देखा जाए तो सरकार द्वारा कोरोना संकट को देखते हुए राशन कार्डधारकों को मुफ्त अनाज की घोषणा नवम्बर तक की गयी है, सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार ये आगे भी बढाई जाने की संभावना है. किन्तु जो इस योजना से भी वंचित हो एक बड़ा वर्ग जिनकों विभिन्न प्रकार के सरकारी योजनाओं का लाभ समुचित रूप से नहीं मिल पा रहा हो. ये उन तबकों की झोली तक पहुँचने से कोसों दूर हो, जिनके खाता में 1000₹ अब तक नहीं गया है.
वो यहाँ से वहाँ चक्कर काटते रहते हैं. ऐसी स्थिति जिसमें गरीबी पहले से ही व्यापत हो. स्थिति का खराब होना स्वाभाविक है. जिसकी वजह से इसका असर लोगों के स्वास्थ्य पर पडता है, शरीर को जो पोषण तत्व मिलनी चाहिए उसके नहीं मिल पाने से वे कुपोषण का शिकार होते जा रहें हैं. वैसे लोग जो असंगठित सेक्टर से आते हैं जिनकी रोजीरोटी पूर्णतः बाजार पर निर्भर होते हैं. अचानक लाॅकडाउन के वजह से काम- काज का ठप हो जाने का बड़ा झटका पडा़ है. जिससे निकलना अधिक कठिन मालूम पड़ता है. आधी दुनियाँ मौलिक आवश्यकता के अभाव में जीवन व्यतीत करने को विवश हैं.
भोजन के साथ ही मनुष्य की मौलिक जरुरतें भी मायने रखती है. यू. एन. की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है ,कि आर्थिक मंदी और जलवायु परिवर्तन संबंधित घटनाओं ने अधिक लोगों को भूखमरी की और धकेल दिया है. पोषक आहार अभी भी लोगों के पहुंच से दूर है. अच्छे स्वास्थ्य के लिए संतुलित आहार जरुरी हैं जिनमें कुछ आवश्यक तत्व - प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन, फाइबर और जल आदि की आवश्यकता होती है. जिसके सही तरीके से शरीर को पोषण न मिलने से व्यक्ति के स्वास्थ्य पर बुरा असर पडता है और कुपोषण के शिकार हो जाते हैं, और फिर बीमार रहने लगते हैं.
लंबे समय तक भूखमरी के कारण शरीर के कुछ अंग नष्ट होने की संभावना बढ़ जाती है. रिसर्च में पाया गया है कि इससे मृत्यु होने के भी चांसेज बढ जाते है. विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि विश्व के संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए भूख स्वयं भी एक बड़ी समस्या है. उनका मानना है, कि ये समस्या जो बच्चे में कुपोषण का होना पूरी विश्व के लिए एक गंभीर समस्या बनी हुई हैं. विश्व भर में लगभग 15 करोड़ से अधिक बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. देखा जाए तो कुपोषण सभी उम्र के लोगों के स्वास्थ्य के लिए घातक है.
बच्चे के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए कुछ आवश्यक पोषक तत्वों का न मिल पाना जो कि गर्भवती महिला और शिशु के आरंभिक वर्षों में बेहतर स्वास्थ्य एवं पोषण का होना अत्यधिक मायने रखता है. बच्चे एवं माँ दोनों को विटामिन, कैल्शियम, आयरन, वसा और कार्बोहाइड्रेट, वाले पोषक तत्वों की आवश्यकता होती हैं. रिसर्च के अनुसार कुपोषण में बच्चे कमजोर हो जाते हैं एवं उनके शरीर की प्रतिरक्षा शक्ति कमजोर हो जाती है. जो कि बच्चे के आखों को भी प्रभावित करता है.
प्रतिरक्षा शक्ति मजबूत होने से शरीर को विभिन्न प्रकार के रोगों से लड़ने की क्षमता होती हैंं. कोरोना संकट से निपटने में भी अत्यधिक सहायक सिद्ध हो रही है. आज के बच्चे कल के भविष्य होतें, ऐसे में बच्चे के भविष्य देश की भविष्य से जुड़े होते हैं. यूँ तो हम कहते भी है कि आज के बच्चे कल के भविष्य हैं. ऐसे में बच्चे के स्वास्थ्य से जुड़ी कुपोषण की समस्या के समाधान हेतु निरंतर प्रयास किया जाना कितना आवश्यक है. सरकार द्वारा भुखमरी से जुड़ी कुपोषण की समस्या को दूर करने हेतु चलाई जा रही योजनायें:- बाल विकास परियोजनाएं व स्वास्थ्य विभाग द्वारा मिलकर कई योजनाएं चला रहीं हैं.
बच्चे के स्वास्थ्य को बेहतर करने के लिए महिलाओं के स्वास्थ्य को बेहतर करना होगा. एकीकृत बाल विकास सेवाएं (आईसीडीएस) जननी सुरक्षा योजना. कई योजनायें तो चलायी जाती है पर यह सीधा- सीधा उन लोगों तक पहुँच ही नहीं पाता तथा उन्हें सरकार द्वारा चलायी जाने वाली योजनाओं की जानकारी सही मायने में पता नहीं होता हैं. जब व्यापक स्तर पर भूखमरी की समस्या हो तो ऐसे में आवश्यक पोषक तत्व को उन वर्ग तक पहुँचाने की जिम्मेवारी ज्यादा होती है जो भुखमरी की समस्या से गुजर रहे हैं.
भुखमरी की समस्या भोजन की अनुपलब्धता से उत्पन्न होती हैं. एफएओ खाद्य एवं कृषि संगठन प्रतिदिन 1800 किलो कैलोरी से कम ग्रहण करने वाले लोगों को भुखमरी से ग्रसित होते मानते हैं. भारत के सभी नागरिकों को भोजन मुहैया कराने के लिए पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न उत्पादन करता है, फिर भी वैश्विक भूख इंडैक्स रैंकिंग में 119 देशों में यह 103 वें स्थान पर है. वैश्विक स्तर पर सभी के लिये खाद्य उत्पादन पर्याप्त होने के बाद भी लगभग 815 मिलीयन लोग ऐसे है जो अल्प पोषण ( Under Nourishment) की समस्या से आज अल्पपिडित है.
भुखमरी के पीछे की वजह गरीबी तथा आमदनी का कम होना है. इस तरह से अच्छें पोषक तत्वों कि अभाव के कारण लोगों के पहुँच से ज्यादा ज्यादातर दूर ही रहते है. गरीबी होने के कारण पोषक तत्वों की कमी के कारण बुरे परिणाम सामने आते हैं, जिनसे महिलायें ज्यादा प्रभावित होती हैं. और यही प्रभाव उनके बच्चे के स्वास्थ्य से जुड़ जाती हैं. और वह कई प्रकार के रोगों से पिडित हो जाते हैं. भूख से स्वास्थ्य की समस्या जुड़ी है ऐसे में भूख की समस्या जो गंभीर हैं उनके बेहतर निदान हेतु व्यापक स्तर पर इसे मिटाने को लेकर जोरदार प्रयास निरंतर किया जाना शामिल हैं, लोगों को काम चाहिए.
तभी हम भूखमरी से निजात पा सकते हैं. असंगठित क्षेत्र में बहुतायत में रोजगार का छूट जाना जिससे लोग कोरोना जैसी महामारी से तो बच सकते हैं पर वे आगामी अपने भविष्य से जुड़े मौलिक जरूरतें को कहाँ से पुरा करें. चिंता इसकी भरपाई की है. जरूरत है कि लोगों को समस्या से उबारने के लिए रोजगार, मनरेगा मजदूर को काम अधिक दिनों तक मिले.तथा रोजगार हेतु.जौखिम को कम करने में सरकार द्वारा दी जाने वाली योजनाएं एवं उनसे होने वाले लाभ उन तक सामान्य रूप से बिना बिचैलियों के आसानी से पहुंच सके.
स्वरोजगार स्थापित करने में आसान से आसान किस्ते की दर से श्रृण मुहैया कराये जाए, वही महिलाओं की भागीदारी महत्वपूर्ण है उन्हें भी सकल घरेलू उत्पाद को बेहतर ढंग से बढाने में बढावा दिये जाने से अर्थव्यवस्था में कुछ राहत होने की संभावनये हो. ताकि हर कोई आसानी से रोजगार स्थापित कर अपने जीवन स्तर को बढ़ा कर और बेहतर जीवन व्यतीत करने में सक्षम बन सकें.
आर्थिक विकास में सर्वागीण विकास का होना जरूरी है. लोगों को संतुलित भोजन की इतनी मात्रा मिले कि वे कुपोषण के दायरे से बाहर निकल कर एक स्वस्थ जीवन जी सकें. हालांकि कि देखा जाए तो सरकार द्वारा कोरोना संकट को देखते हुए राशन कार्डधारकों को मुफ्त अनाज की घोषणा नवम्बर तक की गयी है, सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार ये आगे भी बढाई जाने की संभावना है. किन्तु जो इस योजना से भी वंचित हो एक बड़ा वर्ग जिनकों विभिन्न प्रकार के सरकारी योजनाओं का लाभ समुचित रूप से नहीं मिल पा रहा हो. ये उन तबकों की झोली तक पहुँचने से कोसों दूर हो, जिनके खाता में 1000₹ अब तक नहीं गया है.
वो यहाँ से वहाँ चक्कर काटते रहते हैं. ऐसी स्थिति जिसमें गरीबी पहले से ही व्यापत हो. स्थिति का खराब होना स्वाभाविक है. जिसकी वजह से इसका असर लोगों के स्वास्थ्य पर पडता है, शरीर को जो पोषण तत्व मिलनी चाहिए उसके नहीं मिल पाने से वे कुपोषण का शिकार होते जा रहें हैं. वैसे लोग जो असंगठित सेक्टर से आते हैं जिनकी रोजीरोटी पूर्णतः बाजार पर निर्भर होते हैं. अचानक लाॅकडाउन के वजह से काम- काज का ठप हो जाने का बड़ा झटका पडा़ है. जिससे निकलना अधिक कठिन मालूम पड़ता है. आधी दुनियाँ मौलिक आवश्यकता के अभाव में जीवन व्यतीत करने को विवश हैं.
भोजन के साथ ही मनुष्य की मौलिक जरुरतें भी मायने रखती है. यू. एन. की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है ,कि आर्थिक मंदी और जलवायु परिवर्तन संबंधित घटनाओं ने अधिक लोगों को भूखमरी की और धकेल दिया है. पोषक आहार अभी भी लोगों के पहुंच से दूर है. अच्छे स्वास्थ्य के लिए संतुलित आहार जरुरी हैं जिनमें कुछ आवश्यक तत्व - प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन, फाइबर और जल आदि की आवश्यकता होती है. जिसके सही तरीके से शरीर को पोषण न मिलने से व्यक्ति के स्वास्थ्य पर बुरा असर पडता है और कुपोषण के शिकार हो जाते हैं, और फिर बीमार रहने लगते हैं.
लंबे समय तक भूखमरी के कारण शरीर के कुछ अंग नष्ट होने की संभावना बढ़ जाती है. रिसर्च में पाया गया है कि इससे मृत्यु होने के भी चांसेज बढ जाते है. विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि विश्व के संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए भूख स्वयं भी एक बड़ी समस्या है. उनका मानना है, कि ये समस्या जो बच्चे में कुपोषण का होना पूरी विश्व के लिए एक गंभीर समस्या बनी हुई हैं. विश्व भर में लगभग 15 करोड़ से अधिक बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. देखा जाए तो कुपोषण सभी उम्र के लोगों के स्वास्थ्य के लिए घातक है.
बच्चे के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए कुछ आवश्यक पोषक तत्वों का न मिल पाना जो कि गर्भवती महिला और शिशु के आरंभिक वर्षों में बेहतर स्वास्थ्य एवं पोषण का होना अत्यधिक मायने रखता है. बच्चे एवं माँ दोनों को विटामिन, कैल्शियम, आयरन, वसा और कार्बोहाइड्रेट, वाले पोषक तत्वों की आवश्यकता होती हैं. रिसर्च के अनुसार कुपोषण में बच्चे कमजोर हो जाते हैं एवं उनके शरीर की प्रतिरक्षा शक्ति कमजोर हो जाती है. जो कि बच्चे के आखों को भी प्रभावित करता है.
प्रतिरक्षा शक्ति मजबूत होने से शरीर को विभिन्न प्रकार के रोगों से लड़ने की क्षमता होती हैंं. कोरोना संकट से निपटने में भी अत्यधिक सहायक सिद्ध हो रही है. आज के बच्चे कल के भविष्य होतें, ऐसे में बच्चे के भविष्य देश की भविष्य से जुड़े होते हैं. यूँ तो हम कहते भी है कि आज के बच्चे कल के भविष्य हैं. ऐसे में बच्चे के स्वास्थ्य से जुड़ी कुपोषण की समस्या के समाधान हेतु निरंतर प्रयास किया जाना कितना आवश्यक है. सरकार द्वारा भुखमरी से जुड़ी कुपोषण की समस्या को दूर करने हेतु चलाई जा रही योजनायें:- बाल विकास परियोजनाएं व स्वास्थ्य विभाग द्वारा मिलकर कई योजनाएं चला रहीं हैं.
बच्चे के स्वास्थ्य को बेहतर करने के लिए महिलाओं के स्वास्थ्य को बेहतर करना होगा. एकीकृत बाल विकास सेवाएं (आईसीडीएस) जननी सुरक्षा योजना. कई योजनायें तो चलायी जाती है पर यह सीधा- सीधा उन लोगों तक पहुँच ही नहीं पाता तथा उन्हें सरकार द्वारा चलायी जाने वाली योजनाओं की जानकारी सही मायने में पता नहीं होता हैं. जब व्यापक स्तर पर भूखमरी की समस्या हो तो ऐसे में आवश्यक पोषक तत्व को उन वर्ग तक पहुँचाने की जिम्मेवारी ज्यादा होती है जो भुखमरी की समस्या से गुजर रहे हैं.
भुखमरी की समस्या भोजन की अनुपलब्धता से उत्पन्न होती हैं. एफएओ खाद्य एवं कृषि संगठन प्रतिदिन 1800 किलो कैलोरी से कम ग्रहण करने वाले लोगों को भुखमरी से ग्रसित होते मानते हैं. भारत के सभी नागरिकों को भोजन मुहैया कराने के लिए पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न उत्पादन करता है, फिर भी वैश्विक भूख इंडैक्स रैंकिंग में 119 देशों में यह 103 वें स्थान पर है. वैश्विक स्तर पर सभी के लिये खाद्य उत्पादन पर्याप्त होने के बाद भी लगभग 815 मिलीयन लोग ऐसे है जो अल्प पोषण ( Under Nourishment) की समस्या से आज अल्पपिडित है.
भुखमरी के पीछे की वजह गरीबी तथा आमदनी का कम होना है. इस तरह से अच्छें पोषक तत्वों कि अभाव के कारण लोगों के पहुँच से ज्यादा ज्यादातर दूर ही रहते है. गरीबी होने के कारण पोषक तत्वों की कमी के कारण बुरे परिणाम सामने आते हैं, जिनसे महिलायें ज्यादा प्रभावित होती हैं. और यही प्रभाव उनके बच्चे के स्वास्थ्य से जुड़ जाती हैं. और वह कई प्रकार के रोगों से पिडित हो जाते हैं. भूख से स्वास्थ्य की समस्या जुड़ी है ऐसे में भूख की समस्या जो गंभीर हैं उनके बेहतर निदान हेतु व्यापक स्तर पर इसे मिटाने को लेकर जोरदार प्रयास निरंतर किया जाना शामिल हैं, लोगों को काम चाहिए.
तभी हम भूखमरी से निजात पा सकते हैं. असंगठित क्षेत्र में बहुतायत में रोजगार का छूट जाना जिससे लोग कोरोना जैसी महामारी से तो बच सकते हैं पर वे आगामी अपने भविष्य से जुड़े मौलिक जरूरतें को कहाँ से पुरा करें. चिंता इसकी भरपाई की है. जरूरत है कि लोगों को समस्या से उबारने के लिए रोजगार, मनरेगा मजदूर को काम अधिक दिनों तक मिले.तथा रोजगार हेतु.जौखिम को कम करने में सरकार द्वारा दी जाने वाली योजनाएं एवं उनसे होने वाले लाभ उन तक सामान्य रूप से बिना बिचैलियों के आसानी से पहुंच सके.
स्वरोजगार स्थापित करने में आसान से आसान किस्ते की दर से श्रृण मुहैया कराये जाए, वही महिलाओं की भागीदारी महत्वपूर्ण है उन्हें भी सकल घरेलू उत्पाद को बेहतर ढंग से बढाने में बढावा दिये जाने से अर्थव्यवस्था में कुछ राहत होने की संभावनये हो. ताकि हर कोई आसानी से रोजगार स्थापित कर अपने जीवन स्तर को बढ़ा कर और बेहतर जीवन व्यतीत करने में सक्षम बन सकें.
(रिपोर्ट:- कौस्तुभा)
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