मधेपुरा: बिहार सरकार शिक्षा के साथ कला एवं संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) प्रशिक्षण केंद्रों में नाटक प्रतियोगिताओं का आयोजन कर रही है. सरकार की यह पहल निश्चित रूप से सराहनीय है. इससे प्रशिक्षु शिक्षकों और विद्यार्थियों में रंगमंच के प्रति रुचि बढ़ेगी तथा उनकी रचनात्मक प्रतिभा को सामने आने का अवसर मिलेगा. हालांकि, इस पहल के बीच सरकारी विद्यालयों में नाटक शिक्षकों की बहाली का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है. सवाल यह है कि जब सरकार नाटक और रंगमंच को प्रोत्साहित करने के लिए प्रतियोगिताएं आयोजित कर रही है, तो विद्यालयों में नाटक की नियमित शिक्षा देने के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति क्यों नहीं की जा रही है? सरकारी स्कूलों में संगीत, कला और अन्य गतिविधियों को बढ़ावा देने की बात तो होती है, लेकिन नाटक को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाने की दिशा में अब तक कोई ठोस व्यवस्था नजर नहीं आती. रंगमंच में डिग्रीधारी सुनीत साना, अमित कुमार अंशु एवं अमित आनंद का मानना है कि नाटक केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि बच्चों के सर्वांगीण विकास का प्रभावी साधन है. इसके माध्यम से विद्यार्थियों में आत्मविश्वास, संवाद कौशल, अभिव्यक्ति क्षमता, नेतृत्व क्षमता, अनुशासन और सामाजिक सरोकारों की समझ विकसित की जा सकती है. मंच पर अभिनय करने से बच्चों की झिझक दूर होती है और वे अपनी बात बेहतर तरीके से रखने में सक्षम बनते हैं. उनका कहना है कि केवल प्रतियोगिताओं के आयोजन से रंगमंच को विद्यालयी शिक्षा में स्थापित नहीं किया जा सकता. इसके लिए सरकारी स्कूलों में नाटक शिक्षकों की नियुक्ति, नियमित नाट्य कक्षाओं की व्यवस्था और विद्यार्थियों को मंच उपलब्ध कराना भी जरूरी है. अब सवाल यह है कि बिहार सरकार नाटक को विद्यालयी पाठ्यक्रम और सह-शैक्षणिक गतिविधियों से जोड़ने की पहल कब करेगी? जब बच्चों को मंच पर अभिनय सिखाने की पहल हो रही है, तो उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए सरकारी विद्यालयों में नाटक शिक्षकों की बहाली कब होगी? सरकार को इस दिशा में ठोस नीति बनाकर नाट्य शिक्षकों की नियुक्ति करनी चाहिए, ताकि कला-संस्कृति को बढ़ावा देने का उद्देश्य केवल प्रतियोगिताओं तक सीमित न रह जाए.
(रिपोर्ट:- गरिमा उर्विशा)
पब्लिसिटी के लिए नहीं पब्लिक के लिए काम करना ही पत्रकारिता है....










