1853 से हो रही बड़ी दुर्गा स्थान में मां दुर्गा की पूजा, मिथिला परंपरा से जुड़ी है विशेष पहचान - मधेपुरा खबर Madhepura Khabar

 

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9 अक्टूबर 2026

1853 से हो रही बड़ी दुर्गा स्थान में मां दुर्गा की पूजा, मिथिला परंपरा से जुड़ी है विशेष पहचान

मधेपुरा: जिला मुख्यालय स्थित सार्वजनिक श्री बड़ी दुर्गा स्थान का इतिहास करीब 173 वर्षों पुराना है। वर्ष 1853 ईस्वी से यहां मां दुर्गा की पूजा-अर्चना की परंपरा चली आ रही है। शुरुआती दौर में मंदिर परिसर में झोपड़ी बनाकर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाती थी और श्रद्धालु पूरी आस्था के साथ पूजा-अर्चना करते थे। समय के साथ स्थानीय लोगों की सहभागिता और सहयोग से मंदिर का विकास होता गया। वर्ष 2005 में यहां भव्य मंदिर के निर्माण की शुरुआत की गई। आज यह मंदिर दो मंजिला भव्य संरचना के रूप में स्थापित है और मधेपुरा के सबसे पुराने धार्मिक स्थलों में अपनी विशेष पहचान रखता है।बड़ी दुर्गा स्थान केवल पूजा-अर्चना का केंद्र ही नहीं, बल्कि क्षेत्र की धार्मिक आस्था, परंपरा और सामाजिक एकजुटता का भी प्रतीक है। नवरात्र के दौरान यहां भक्तिमय माहौल बना रहता है। कलश स्थापना से लेकर महानवमी तक नियमित रूप से आरती और पूजा-पाठ किया जाता है। खासकर शाम के समय मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। मां के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए दूर-दराज के इलाकों से भी भक्त पहुंचते हैं।

मिथिला परंपरा के अनुसार होती है पूजा-अर्चना

मंदिर कमेटी के अध्यक्ष हरिश्चंद्र साह ने बताया कि बड़ी दुर्गा स्थान में मिथिला की पारंपरिक विधि-विधान के अनुसार नवरात्र की पूजा की जाती है। यहां पूजा की अपनी विशिष्ट परंपरा है, जो वर्षों से चली आ रही है। मंदिर की सबसे खास विशेषताओं में मां दुर्गा की प्रतिमा के स्वरूप से जुड़ी परंपरा शामिल है। अध्यक्ष के अनुसार, सप्तमी की रात पत्रिका प्रवेश और जन्म पूजा की रस्म पूरी होने के बाद मां की प्रतिमा का स्वरूप बदला हुआ दिखाई देता है। श्रद्धालुओं की मान्यता के अनुसार, उस समय मां का रूप मूर्तिकार द्वारा तैयार किए गए मूल स्वरूप से अलग नजर आता है। यही विशेषता इस मंदिर को अन्य पूजा स्थलों से अलग पहचान देती है। नवरात्र के दौरान मंदिर में विधि-विधान से पूजा संपन्न कराने के लिए विशेष व्यवस्था की जाती है। दुर्गा पूजा के दस दिनों तक रानीपट्टी के पुजारी सुंदरकांत झा पूजा-पाठ कराते हैं। वहीं, मंदिर के नियमित पुजारी अनिल पाठक हैं। उन्होंने बताया कि मंदिर में सालों भर श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है। नवरात्र के अलावा भी भक्त अपनी मनोकामना लेकर मां के दरबार में पहुंचते हैं।

मुंगेर के मूर्तिकार बनाते हैं मां दुर्गा की प्रतिमा

बड़ी दुर्गा स्थान की एक अन्य विशेषता प्रतिमा निर्माण की परंपरा है। मंदिर कमेटी के सदस्यों के अनुसार, यहां प्रत्येक वर्ष मुंगेर के मूर्तिकार संजय पंडित द्वारा मां दुर्गा सहित अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं का निर्माण करते हैं। यह परंपरा मंदिर की स्थापना के समय से चली आ रही है। प्रतिमाओं के निर्माण से लेकर पूजा की तैयारियों तक श्रद्धालुओं और कमेटी के सदस्यों की सक्रिय भागीदारी रहती है। नवरात्र शुरू होने के साथ ही मंदिर परिसर में धार्मिक गतिविधियां तेज हो जाती हैं। मां दुर्गा और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की स्थापना के बाद दर्शन के लिए भक्तों का पहुंचना शुरू हो जाता है। जैसे-जैसे पूजा के दिन आगे बढ़ते हैं, मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या भी बढ़ने लगती है। सप्तमी, अष्टमी और महानवमी के अवसर पर विशेष भीड़ देखने को मिलती है।

अष्टमी को गोईछा भरने के लिए उमड़ती हैं महिलाएं

बड़ी दुर्गा स्थान में पूजा के अंतिम तीन दिनों का विशेष महत्व है। खासकर महाष्टमी के दिन महिलाओं की भारी भीड़ उमड़ती है। इस दिन बड़ी संख्या में महिलाएं मां दुर्गा के दरबार में गोईछा भरने की रस्म निभाने पहुंचती हैं। श्रद्धा और विश्वास के साथ महिलाएं मां से परिवार की सुख-समृद्धि, संतान की खुशहाली और मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करती हैं। अष्टमी के दिन मंदिर परिसर में सुबह से ही भक्तों की आवाजाही बढ़ जाती है। मंदिर कमेटी के अध्यक्ष हरिश्चंद्र साह ने बताया कि प्रत्येक वर्ष सैकड़ों श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होने की आस्था के साथ लोग यहां पूजा करने आते हैं। मधेपुरा के अलावा बिहार के विभिन्न जिलों के अलावे नेपाल तक के श्रद्धालु मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। मनोकामना पूरी होने के बाद भी कई श्रद्धालु मां के दरबार में पूजा-अर्चना करने आते हैं। इस कारण बड़ी दुर्गा मंदिर की प्रसिद्धि जिले की सीमाओं से बाहर तक फैली हुई है।

जगह की कमी, फिर भी रोशनी से जगमगाता है मंदिर परिसर

मधेपुरा के मुख्य मार्ग से सटे होने के कारण बड़ी दुर्गा स्थान तक पहुंचना श्रद्धालुओं के लिए सुविधाजनक है। हालांकि, सड़क के किनारे स्थित होने और आसपास पर्याप्त जगह नहीं होने के कारण पूजा के दौरान बड़े पंडाल के निर्माण में परेशानी होती है। इसके बावजूद मंदिर कमेटी की ओर से श्रद्धालुओं की सुविधा और मंदिर की सजावट पर विशेष ध्यान दिया जाता है। इस वर्ष मंदिर के दोनों ओर सड़क पर करीब 100 मीटर तक आकर्षक लाइटिंग की व्यवस्था की गई है। रोशनी से सजा मंदिर और आसपास का क्षेत्र नवरात्र के दौरान श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनता है। शाम होते ही मंदिर परिसर में भक्तों की भीड़ बढ़ने लगती है और पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है।

मंदिर के नाम पर संचालित है सरकारी प्राथमिक विद्यालय

बड़ी दुर्गा स्थान का प्रभाव धार्मिक गतिविधियों तक ही सीमित नहीं है। मंदिर के नाम पर एक सरकारी प्राथमिक विद्यालय भी संचालित है। यह मंदिर की स्थानीय पहचान और क्षेत्र से उसके पुराने जुड़ाव को दर्शाता है। वर्षों से चली आ रही पूजा परंपरा के कारण मंदिर का मधेपुरा के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में भी महत्वपूर्ण स्थान है। करीब पौने दो शताब्दियों से अधिक समय से चली आ रही पूजा परंपरा, मिथिला रीति-रिवाज, प्रतिमा निर्माण की विशिष्ट व्यवस्था और श्रद्धालुओं की अटूट आस्था ने सार्वजनिक बड़ी दुर्गा स्थान को मधेपुरा की धार्मिक पहचान का अहम हिस्सा बना दिया है। हर वर्ष नवरात्र के अवसर पर यहां उमड़ने वाली भीड़ इस बात का प्रमाण है कि समय के साथ मंदिर का स्वरूप भले ही बदल गया हो, लेकिन मां दुर्गा के प्रति लोगों की श्रद्धा आज भी उतनी ही गहरी बनी हुई है।

(रिपोर्ट:- सुनीत साना)

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