तीन दिनों में सौ से अधिक झटके। हजारों घर भरभरा गए। जिंदगियां तबाह हो गयीं। पीछे लाशों का बिछौना। आगे खतरों का तूफान। हर पल हर कदम मौत का अहसास। ऐसे ही हालात में 72 घंटे बाद अगर कोई परिवार सकुशल निकल आए तो उसकी खुशियों का अंदाज लगाया जा सकता है। वीरगंज के अमित राज और उनकी पत्नी टीना राज जब दो मासूम बच्चों के साथ मौत की जंग जीतकर मंगलवार की सुबह घर लौटे तो परिजनों ने उनकी आरती उतारी। देखने के लिए पड़ोसियों की कतार लग गयी। इसलिए कि समय के साथ लोगों की उम्मीदें कमजोर पड़ती जा रही थीं।
वीरगंज के अमित राज काठमांडू के नेशफील्ड इंटरनेशनल कालेज में प्रोफेसर हैं। काठमांडू के मैंसेगटी के तीन मंजिले मकान में रहते हैं। 25 अप्रैल की दोपहर नेपाली समय के अनुसार 12 बजे उनकी पत्नी खाना बना रही थीं तो अचानक सबकुछ डोलने लगा। पैर टिक नहीं पा रहे थे। बच्चे गेंद की तरह लुढ़क रहे थे। अमित समझ गए कि भूकंप आया है। जैसे-तैसे पत्नी व बच्चों को साथ लेकर बाहर निकलने को भागे लेकिन मात्र दस फीट दूर दरवाजे तक भी नहीं पहुंच सके। करीब चार मिनट तक यह सिलसिला चलता रहा। तब बच्चों को लपेटकर अमित ने अपनी आंखें बंद कर लीं। अब केवल भगवान का सहारा था और मौत का इंतजार। इसी बीच काल ने मानो सांस ली। कंपन करीब दस मिनट के लिए थमा। यह भागने का मौका था। अमित बच्चों के साथ सबकुछ छोड़कर खेत की ओर भागे और अहसास किया कि इस तबाही में हजारों मरे होंगे। खाना था नहंी। बिस्कुट खाकर रात गुजारी। दो बोतल पानी में सपरिवार दो दिन काम चलाया। मुसीबत यहीं पर खत्म नहीं हुई। हल्के-हल्के झटकों के बीच अगले दिन फिर भूचाल। बारिश भी शुरू। टेंट लगाया तो वह भी चूने लगा। नीचे कंपन ओर ऊपर से टिप-टिप। बच्चों को ठंड लगने लगी तो बाप ने हिम्मत दिखाई और घर से कंबल निकाल लाए। अगली सुबह। अब और इंतजार नहीं। पुरखों के गांव जाने के लिए तैयार हुए तो साठ-साठ हजार भाड़ा मांगा जाने लगा। पैसे थे नहीं। अपनी कार निकाली और वीरगंज के लिए रवाना हो गए। हाइवे पहुंचे तो बलखू और कलंकी के बीच लाखों लोग घर जाने की आपाधापी में थे। अमित का परिवार फंसते निकलते आगे बढ़ा। लेकिन कुरिन के पहले मनिहारी पहाड़ी ने भरभरा कर एक बार फिर रास्ता रोक लिया। वहां भी छह घंटे इंतजार करना पड़ा। मलबा हटा तो नारायण घाट तक 35 किलोमीटर दूरी तय करने में आठ घंटे लग गए। जैसे-जैसे रास्ते सिमट रहे थे अमित मौत के खौफ को पीछे ढकेलते जा रहे थे। मंगलवार की सुबह जब घर पहुंचे तो मां ने उनकी आरती उतारी।








