09/10/2015 रवींद्र जैन के फिल्म इंडस्ट्री में सबसे अच्छे रिश्ते रहे. बीमार पड़ने से पहले तक वे काम करते रहे. उनके पास कई फिल्मों के प्रस्ताव अब भी आते थे. रवींद्र जी ने इंडस्ट्री में अपने सफर को लेकर एक कविता बनाई थी, जिसे अक्सर गुनगुना कर सुनाते थे. तन के हिस्से में सिर्फ दो आंखें हैं. मन की आंखें हजार होती हैं. तन की आंखें सो भी जाती हैं. मन की आंखें कभी ना सोती हैं. रवींद्र जी के पिता अलीगढ़ में आयुर्वेदाचार्य थे. रवींद्र जी जन्म के समय ही दृष्टिहीन थे. उनके परिवार के मित्र मोहनलाल आंखों के प्रसिद्ध डॉक्टर थे. वह जब बाल रवींद्र की आंखों का ऑपरेशन करने गए तो उन्होंने घर वालों को बता दिया कि बालक की दृष्टि कमजोर है और कभी ठीक नहीं होगी. रवींद्र महज पांचवीं तक स्कूल जा पाए, इसके बाद घर पर अपने भाई से सुन-सुन कर उन्होंने पढ़ाई की. लेकिन उनमें हीन भावना कभी नहीं आई. वे दोस्तों के साथ अंताक्षरी खेलते, अपना लिखा गाना गाते. इसके बाद परिवार वालों के कहने पर किस्मत आजमाने कोलकाता चले गए. कोलकत्ता में उन्होंने संगीत की शिक्षा ली और बचे वक्त में महफिलों में गाना गाया. वहीं हिंदी फिल्म निर्माता राधेश्याम झुनझुनवाला से उनकी मुलाकात हुई और उनका हौसला पा कर उन्होंने मुंबई की फिल्मी दुनिया में कदम रखा. उन्होंने कभी किसी से दृष्टिहीनता को लेकर शिकायत नहीं की और ना ही अपने लिए किसी खास चीज की मांग की. वह मानते थे कि अगर आप अपना काम जानते हैं, तो शारीरिक अपंगता कभी आपके आड़े नहीं आती. सन 1974 में आई चर्चित फिल्म चोर मचाए शोर का संगीत बहुत लोकप्रिय हुआ था. सिप्पी साहब रवींद्र जैन से कुछ अलग पैपी किस्म का काम चाहते थे. फिल्म के नायक शशि कपूर और सिप्पी साहब को रवींद्र जी जो भी धुन सुनाते, वो रिजेक्ट कर देते. रवींद्र जी खीझ गए. मन बना लिया कि फिल्म छोड़ देंगे. जब वह सिप्पी जी से फिल्म छोड़ने की बात करने गए, तो उन्होंने कहा, जो तुम्हारे दिल में है, वो धुन सुनाओ. रवींद्र जी ने बेमन से ले जाएंगे, ले जाएंगे, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे को गुनगुना दिया, यह सोच कर कि वह फिर से खारिज कर दिए जाएंगे. पर यह धुन सुन कर शशि कपूर और सिप्पी साहब उछल पडे़ और बोले यही तो चाहिए था हमें. इस फिल्म के बाद रवींद्र जी का नाम अग्रणी संगीतकारों की फेहरिस्त में आ गया.
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10 अक्टूबर 2015
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'मन की आंखें हजार होती हैं'
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