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| पूजा गुप्ता |
"ये मत कहो खुदा से मेरी मुश्किले बड़ी हैं. मुश्किलों से कह दो मेरा खुदा बड़ा है." आज हम आप सबको एक ऐसी लड़की से रूबरू करवाने जा रहे हैं जिन्होंने अपने पांव तो खो दिए मगर अब भी अपने सपनों में उड़ान भरने का जज्बा रखती हैं.
महिला सशक्तिकरण को प्रस्तुत कर रही मधेपुरा जिला अंतर्गत सिंहेश्वर प्रखंड स्थित शांतिवन गली निवासी व्यवसायी प्रमोद गुप्ता एवं गुड्डी देवी की सुपुत्री पूजा गुप्ता के जीवन में घटी एक घटना ने उनकी जिंदगी के रूख को मोड़कर धराशायी कर दिया मगर लंबे समय के संघर्ष के बाद पूजा नई ऊर्जा के साथ अपने हौसलों को उड़ान देना चाहती हैं.
आइए जानते हैं पूजा के बारे में उन्हीं की जुबानी:-
पूजा अपने बारे में बताते हुए कहती हैं कि मैं 2010 में 9वीं की पढ़ाई कर रही थी. पढ़ाई में अच्छी होने के कारण अपने क्लास के साथ-साथ पूरे स्कूल में टॉप आयी. मैं बहुत ही ज्यादा खुश थी. पता नहीं पर मेरी खुशी को शायद किसी की नज़र लग गयी. मैं उन दिनों अपनी सहेलियों के साथ रोज़ स्कूल जाया करती थी, मुझे पढ़ना बहुत अच्छा लगता था.
उसी वर्ष मेरे साथ एक ऐसी घटना घटी जिसने पूरी तरह मेरी जिंदगी को पलट के रख दिया. मैं अपने छत से गिर गयी और उसके बाद आज तक अपने पैरों पर खड़ी हो पाई हूं ओर न ही चल पायी. यह घटना मेरे लिए बहुत बड़ा सदमा था. मधेपुरा में डॉ. उदित राजा के पास मेरा इलाज करवाया गया. मेरे स्पाइनल कॉर्ड की एक हड्डी टूट गई थी.
असहनीय दर्द हो रहा था. डॉ. को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें, क्या नहीं करें. मेरे दोनों पैरों ने काम करना बंद कर दिया. मधेपुरा से पटना रेफर कर दिया गया. माँ-पापा की आंखों से आँसू नहीं रूक रहे थे. तेज बारिश हो रही थी और मैं दर्द से कराह रही थी. जैसे-तैसे पटना होप हॉस्पिटल पहुँची. लेकिन तबतक हॉस्पिटल बन्द हो चुका था. हॉस्पिटल में एंट्री भी नहीं मिल पा रही थी.
जब हॉस्पिटल खुला तो हॉस्पिटल का नियम आड़े आ गया, मतलब कि फार्म भरने के बाद ही पेशेंट को एडमिट लिया जाएगा. दो दिनों के बाद मेरा ऑपरेशन किया गया. मेरी स्पाइनल की जो हड्डी टूटी थी उसे निकालकर वहां पर स्प्रिंग सेट किया गया. खर्चे का कोई हिसाब-किताब नहीं था. घाव भरने के बाद बेड रेस्ट और एक्सरसाइज करने में महीनों लग गए. मैं बहुत मेहनत से एक्सरसाइज करती, समय पर दावा लेती ओर ये सोचती रहती कि कब मैं ठीक हो जाऊं और अपने घर जाऊंगी ताकि अपनी पढ़ाई पूरी कर सकूं और पहले की तरह खूब खेल-कूद भी कर सकूं.
मैं सभी चीजों को बहुत मिस करती थी. बार-बार डॉ अंकल से पूछती रहती थी कि मैं कब ठीक हो पाऊँगी? तीन महीनों के बाद मैं घर तो आ गयी पर चल नहीं पा रही थी. मेरे पापा दिन-रात मेरे पीछे ही लगे रहते थे, एक्सरसाइज करवाते थे, समय-समय पे दावा देते थे. मैं भी पूरी तरह से मेहनत करती थी. तभी भी कोई फ़र्क नज़र नहीं आ रहा था. उसके बाद दूर-दूर के कई डॉक्टरों के पास इलाज करवाकर ठीक करने की कोशिश की पर किसी का इलाज कोई काम नहीं आ रहा था. अन्त में पापा सिल्लीगुड़ी लेकर गए.
वहाँ के डॉ. ने रिपोर्ट देखते हीं कहा कि अब ये कभी ठीक नहीं हो पायेगी. ये बात मेरे लिए दूसरी बार, बहुत बड़ा सदमा था. जीने की कोई इच्छा ही नहीं रही परंतु मेरे पापा और माँ मेरे लिए वरदान साबित हुए. वे दोनों मेरे दोनों पैर बनकर खड़े हुए. मैं भगवान को दिल से धन्यवाद करती हूं कि उन्होंने मुझे ऐसे माता-पिता दिए. मैं इनका कर्ज़ इस जन्म में तो क्या किसी जन्म में भी नहीं उतार सकती.
लेकिन मेरी हर चीज़ तो पूरी हो जाती थी पर मेरा अकेलापन नहीं. मैं हमेशा बेड पे लेटी सोचती कि कैसे मैं अपना अकेलापन दूर करूं. चारदीवारी के अंदर कोई कर भी क्या सकता है. टी.वी भी देखूं तो कितनी देर तक, मोबाइल भी यूज़ करूं तो कितना. इनसभी चीज़ों से मेरा मन भर गया था ओर कोई रुचि भी नहीं रही. करते तो क्या करते, जाते तो कहाँ जाते, कहीं जा भी नहीं सकते थे.
जैसे-तैसे मैं मन लगाने की कोशिश करती रहती पर मन भी बेचारा केतना देर तक मन मार के मेरा मन लगाता. माँ-पापा को जितना भी समय मिल पाता वो हमें देते थे पर ये भी तो सच था कि वो भी तो हमेशा मेरे साथ समय नहीं दे सकते थे, क्योंकि उनको भी तो अपना-अपना काम था. मन तो करता था कि अपने आप को खत्म कर लूं. शुरुवाती समय में मैं शरीर से बहुत कमजोर थी. बात-बात पर गुस्सा करती थी, सामान को यहाँ-वहाँ फेंका करती थी.
मैं बहुत ज्यादा चीड़-चिड़ी हो गयी थी. बार-बार खुद को मार डालने का मन करता था. पर मेरा दर्द माँ-पापा के प्यार के सामने फीका पड़ जाता था. मेरी माँ हमेशा मेरा सपोर्ट करती रही, हिम्मत देती रही और मैं खुद को धीरे-धीरे मजबूत करती गयी. सबके लिए उनके पापा हीरो होंगें पर मेरे लिये तो मेरे पापा सुपर हीरो हैं. माँ-पापा का प्यार और मेरे प्रति देखभाल इतना था कि मेरे अन्दर का दुःख उनके प्यार के सामने फीका पड़ने लगा.
मैं खुद को बहुत ही भाग्यशाली समझती हूँ कि ऐसा अनमोल प्यार हमे इस दुनिया में ओर कोई नहीं दे सकता. माता-पिता के मोह के कारण मैं कभी भी कोई गलत कदम नहीं उठा पायी. मेरी इस स्थिति को लगभग 9 साल से ज्यादा होने को है. मेरी पढ़ाई भी पूरी तरह से छूट गयी, मैं पढ़ना चाहती थी पर बिहार सरकार ऐसी कोई सुविधा मुहैया नहीं करा पायी थी कि मैं अपनी पढ़ाई अपने घर से ही पूरी कर सकूं. मेरी माँ हमेशा हिम्मत देती और कहती थी कि सब ठीक हो जाएगा बस भगवान पर विश्वास रखो.
पर भगवान भी क्या कर सकते थे शायद उनको मेरा दर्द दिखा ही नहीं. मैं बस अपने आप को मजबूत करती गयी और हौसला बुलंद करती गयी. कहते हैं न अगर हौसला बुलंद हो तो शिखर भी अपना सिर झुका लेता है. बाद में धीरे-धीरे मुझे पेंटिंग में रूचि बढ़ने लगी. उसके बाद स्कैच बनाना इत्यादि में. मैं आप सभी से ये कहना चाहती हूँ कि जिंदगी में हर रोज़ एक नया प्रॉब्लम आता है पर मैं डरती नहीं हूं, उससे लड़ने की कोशिश करती हूं.
जीवन में गम कितना भी आ जाये पर हमेशा खुश रहने की कोशिश करती हूं. इसी तरह से मैं जीना सीख चुकी हूँ और जीना भी चाहती हूँ.
(रिपोर्ट:- गरिमा/ सुनीत)
उसी वर्ष मेरे साथ एक ऐसी घटना घटी जिसने पूरी तरह मेरी जिंदगी को पलट के रख दिया. मैं अपने छत से गिर गयी और उसके बाद आज तक अपने पैरों पर खड़ी हो पाई हूं ओर न ही चल पायी. यह घटना मेरे लिए बहुत बड़ा सदमा था. मधेपुरा में डॉ. उदित राजा के पास मेरा इलाज करवाया गया. मेरे स्पाइनल कॉर्ड की एक हड्डी टूट गई थी.
असहनीय दर्द हो रहा था. डॉ. को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें, क्या नहीं करें. मेरे दोनों पैरों ने काम करना बंद कर दिया. मधेपुरा से पटना रेफर कर दिया गया. माँ-पापा की आंखों से आँसू नहीं रूक रहे थे. तेज बारिश हो रही थी और मैं दर्द से कराह रही थी. जैसे-तैसे पटना होप हॉस्पिटल पहुँची. लेकिन तबतक हॉस्पिटल बन्द हो चुका था. हॉस्पिटल में एंट्री भी नहीं मिल पा रही थी.
जब हॉस्पिटल खुला तो हॉस्पिटल का नियम आड़े आ गया, मतलब कि फार्म भरने के बाद ही पेशेंट को एडमिट लिया जाएगा. दो दिनों के बाद मेरा ऑपरेशन किया गया. मेरी स्पाइनल की जो हड्डी टूटी थी उसे निकालकर वहां पर स्प्रिंग सेट किया गया. खर्चे का कोई हिसाब-किताब नहीं था. घाव भरने के बाद बेड रेस्ट और एक्सरसाइज करने में महीनों लग गए. मैं बहुत मेहनत से एक्सरसाइज करती, समय पर दावा लेती ओर ये सोचती रहती कि कब मैं ठीक हो जाऊं और अपने घर जाऊंगी ताकि अपनी पढ़ाई पूरी कर सकूं और पहले की तरह खूब खेल-कूद भी कर सकूं.
मैं सभी चीजों को बहुत मिस करती थी. बार-बार डॉ अंकल से पूछती रहती थी कि मैं कब ठीक हो पाऊँगी? तीन महीनों के बाद मैं घर तो आ गयी पर चल नहीं पा रही थी. मेरे पापा दिन-रात मेरे पीछे ही लगे रहते थे, एक्सरसाइज करवाते थे, समय-समय पे दावा देते थे. मैं भी पूरी तरह से मेहनत करती थी. तभी भी कोई फ़र्क नज़र नहीं आ रहा था. उसके बाद दूर-दूर के कई डॉक्टरों के पास इलाज करवाकर ठीक करने की कोशिश की पर किसी का इलाज कोई काम नहीं आ रहा था. अन्त में पापा सिल्लीगुड़ी लेकर गए.
वहाँ के डॉ. ने रिपोर्ट देखते हीं कहा कि अब ये कभी ठीक नहीं हो पायेगी. ये बात मेरे लिए दूसरी बार, बहुत बड़ा सदमा था. जीने की कोई इच्छा ही नहीं रही परंतु मेरे पापा और माँ मेरे लिए वरदान साबित हुए. वे दोनों मेरे दोनों पैर बनकर खड़े हुए. मैं भगवान को दिल से धन्यवाद करती हूं कि उन्होंने मुझे ऐसे माता-पिता दिए. मैं इनका कर्ज़ इस जन्म में तो क्या किसी जन्म में भी नहीं उतार सकती.
लेकिन मेरी हर चीज़ तो पूरी हो जाती थी पर मेरा अकेलापन नहीं. मैं हमेशा बेड पे लेटी सोचती कि कैसे मैं अपना अकेलापन दूर करूं. चारदीवारी के अंदर कोई कर भी क्या सकता है. टी.वी भी देखूं तो कितनी देर तक, मोबाइल भी यूज़ करूं तो कितना. इनसभी चीज़ों से मेरा मन भर गया था ओर कोई रुचि भी नहीं रही. करते तो क्या करते, जाते तो कहाँ जाते, कहीं जा भी नहीं सकते थे.
जैसे-तैसे मैं मन लगाने की कोशिश करती रहती पर मन भी बेचारा केतना देर तक मन मार के मेरा मन लगाता. माँ-पापा को जितना भी समय मिल पाता वो हमें देते थे पर ये भी तो सच था कि वो भी तो हमेशा मेरे साथ समय नहीं दे सकते थे, क्योंकि उनको भी तो अपना-अपना काम था. मन तो करता था कि अपने आप को खत्म कर लूं. शुरुवाती समय में मैं शरीर से बहुत कमजोर थी. बात-बात पर गुस्सा करती थी, सामान को यहाँ-वहाँ फेंका करती थी.
मैं बहुत ज्यादा चीड़-चिड़ी हो गयी थी. बार-बार खुद को मार डालने का मन करता था. पर मेरा दर्द माँ-पापा के प्यार के सामने फीका पड़ जाता था. मेरी माँ हमेशा मेरा सपोर्ट करती रही, हिम्मत देती रही और मैं खुद को धीरे-धीरे मजबूत करती गयी. सबके लिए उनके पापा हीरो होंगें पर मेरे लिये तो मेरे पापा सुपर हीरो हैं. माँ-पापा का प्यार और मेरे प्रति देखभाल इतना था कि मेरे अन्दर का दुःख उनके प्यार के सामने फीका पड़ने लगा.
मैं खुद को बहुत ही भाग्यशाली समझती हूँ कि ऐसा अनमोल प्यार हमे इस दुनिया में ओर कोई नहीं दे सकता. माता-पिता के मोह के कारण मैं कभी भी कोई गलत कदम नहीं उठा पायी. मेरी इस स्थिति को लगभग 9 साल से ज्यादा होने को है. मेरी पढ़ाई भी पूरी तरह से छूट गयी, मैं पढ़ना चाहती थी पर बिहार सरकार ऐसी कोई सुविधा मुहैया नहीं करा पायी थी कि मैं अपनी पढ़ाई अपने घर से ही पूरी कर सकूं. मेरी माँ हमेशा हिम्मत देती और कहती थी कि सब ठीक हो जाएगा बस भगवान पर विश्वास रखो.
पर भगवान भी क्या कर सकते थे शायद उनको मेरा दर्द दिखा ही नहीं. मैं बस अपने आप को मजबूत करती गयी और हौसला बुलंद करती गयी. कहते हैं न अगर हौसला बुलंद हो तो शिखर भी अपना सिर झुका लेता है. बाद में धीरे-धीरे मुझे पेंटिंग में रूचि बढ़ने लगी. उसके बाद स्कैच बनाना इत्यादि में. मैं आप सभी से ये कहना चाहती हूँ कि जिंदगी में हर रोज़ एक नया प्रॉब्लम आता है पर मैं डरती नहीं हूं, उससे लड़ने की कोशिश करती हूं.
जीवन में गम कितना भी आ जाये पर हमेशा खुश रहने की कोशिश करती हूं. इसी तरह से मैं जीना सीख चुकी हूँ और जीना भी चाहती हूँ.
(रिपोर्ट:- गरिमा/ सुनीत)














