मधेपुरा: मधुबनी पेंटिंग की व्यापकता तेजी से बढ रही है. यह मधुबनी जिले की स्थानीय कला है. इसलिए इसे मधुबनी पेंटिंग कहा जाता है. मधुबनी पेंटिंग की सम्मान को और बढाएं जाने को लेकर मधुबनी जिले में रेलवे स्टेशन के दिवारों पर तकरीबन -10,000 स्क्वायर फीट में मिथिला पेंटिंग की कलाकृतियों से सजाया गया.
उनकी ये पहल नि:शुल्क अथार्त श्रमदान के रूप में किया गया है जो कि एक सराहनीय कदम है. इसकी कलाकारी खास कर अपने चटकीले रंगों के होने से और भी प्रभावित लगती है. यह कला खासकर प्रकृति, पौराणिक कथाओं को तस्वीरों विवाह और जन्म के चक्र जैसे विभिन्न घटनाओं को चित्रित करती है. यह खुबसूरत तरीके से कथाओं को दर्शाती है. मूल रूप से इन चित्रों में कमल के फूल, बांस, चिड़िया, सांप आदि कलाकृतियाँ भी पायी जाती है.
विवाह में कोहबर के लिए भी इस पेंटिंग का खासा उपयोग देखने को मिलता है. मधुबनी पेंटिंग मिथिलांचल में, खासकर बिहार के दरभंगा, मधुबनी, सीतमढी और नेपाल के जनकपुर, सिरहा, धनुषा जैसे जिलों की मेन फोक पेंटिंग है. शुरुआत में यह आंगनो दिवारों पर की जाती थी. हालांकि कि आज मधुबनी पेंटिंग पूरी दुनिया में धूम मचा रही है और कास्ट, रिलीजन और एरिया जैसे पैमानों से ऊपर उठ चुकीं है अब कलाकार इंटरनेशनल बाजार का रुख कर रहे हैं.
मधुबनी पेंटिंग महिलाओं को रोजगार के रूप में आत्मनिर्भर बनाने में काफी सहायक प्रतीत हो रही है . यह पेंटिंग दिवारों. कपड़ों एवं घर की सज्जा आदि में महत्वपूर्ण स्थान निभा रही है. महिलाओं को इस ओर योगदान के लिए सम्मानित किया गया. 1969 में सीता देवी को बिहार सरकार ने मधुबनी पेंटिंग के लिए सम्मानित किया. 1984 में सीता देवी को भी मधुबनी पेंटिंग के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया साथ ही उन्हें 'बिहार रत्न' और 'शिल्प गुरु' से सम्मानित किया गया.
1975 में जगदम्बा देवी को पद्म श्री से सम्मानित किया गया. 2011 में महासुंदरी देवी को भी मधुबनी पेंटिंग के लिए पद्म श्री से सम्मानित किया गया. 2017 में बौआ देवी को भी मधुबनी पेंटिंग के क्षेत्र में अहम योगदान को लिए पद्म श्री से नवाजा गया. गौरतलब है कि महिलायें निरंतर मधुबनी पेंटिंग के क्षेत्र में योगदान दे रही हैं. खास बात - मास्क पर बने मधुबनी पेंटिंग की मांग बाजार में तेजी से बढती देखी जा रही है. लोगों को यह खूब पसंद आ रहा है, यह मास्क पेंटिंग से सजे होने के कारण सुंदर और आकषिर्त लगते हैं.
वही इसकी आनलाईन बिक्री में भी तेजी देखी जा रही हैं. मधुबनी पेंटिंग को केई प्रकार के बिजनेस के साथ सामंजस्य बना कर रोजगार की ओर बेहतर विकल्प साबित हो रहे. चाहिए कि सरकार के द्वारा भी इस ओर अधिक ध्यान देने से पेंटिंग के विस्तार को बढावा मिलेगा और रोजगार के रूप में पेंटिंग मददगार साबित होगी.
उनकी ये पहल नि:शुल्क अथार्त श्रमदान के रूप में किया गया है जो कि एक सराहनीय कदम है. इसकी कलाकारी खास कर अपने चटकीले रंगों के होने से और भी प्रभावित लगती है. यह कला खासकर प्रकृति, पौराणिक कथाओं को तस्वीरों विवाह और जन्म के चक्र जैसे विभिन्न घटनाओं को चित्रित करती है. यह खुबसूरत तरीके से कथाओं को दर्शाती है. मूल रूप से इन चित्रों में कमल के फूल, बांस, चिड़िया, सांप आदि कलाकृतियाँ भी पायी जाती है.
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| कौस्तुभ |
मधुबनी पेंटिंग महिलाओं को रोजगार के रूप में आत्मनिर्भर बनाने में काफी सहायक प्रतीत हो रही है . यह पेंटिंग दिवारों. कपड़ों एवं घर की सज्जा आदि में महत्वपूर्ण स्थान निभा रही है. महिलाओं को इस ओर योगदान के लिए सम्मानित किया गया. 1969 में सीता देवी को बिहार सरकार ने मधुबनी पेंटिंग के लिए सम्मानित किया. 1984 में सीता देवी को भी मधुबनी पेंटिंग के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया साथ ही उन्हें 'बिहार रत्न' और 'शिल्प गुरु' से सम्मानित किया गया.
1975 में जगदम्बा देवी को पद्म श्री से सम्मानित किया गया. 2011 में महासुंदरी देवी को भी मधुबनी पेंटिंग के लिए पद्म श्री से सम्मानित किया गया. 2017 में बौआ देवी को भी मधुबनी पेंटिंग के क्षेत्र में अहम योगदान को लिए पद्म श्री से नवाजा गया. गौरतलब है कि महिलायें निरंतर मधुबनी पेंटिंग के क्षेत्र में योगदान दे रही हैं. खास बात - मास्क पर बने मधुबनी पेंटिंग की मांग बाजार में तेजी से बढती देखी जा रही है. लोगों को यह खूब पसंद आ रहा है, यह मास्क पेंटिंग से सजे होने के कारण सुंदर और आकषिर्त लगते हैं.
वही इसकी आनलाईन बिक्री में भी तेजी देखी जा रही हैं. मधुबनी पेंटिंग को केई प्रकार के बिजनेस के साथ सामंजस्य बना कर रोजगार की ओर बेहतर विकल्प साबित हो रहे. चाहिए कि सरकार के द्वारा भी इस ओर अधिक ध्यान देने से पेंटिंग के विस्तार को बढावा मिलेगा और रोजगार के रूप में पेंटिंग मददगार साबित होगी.
(स्पेशल रिपोर्ट:- कौस्तुभ)
पब्लिसिटी के लिए नहीं पब्लिक के लिए काम करना ही पत्रकारिता है....












