02/06/15 दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा स्टेडियम में आयोजित श्रीमद्भागवत नवाह यज्ञ में कथा वाचिका विश्वंभरा भारती ने भक्त प्रहलाद और समुद्र मंथन प्रसंग पर प्रवचन दिया। होली का आध्यात्मिक अर्थ स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि पूर्ण गुरु की कृपा से ही अन्तर हृदय में परमात्मा के प्रकाश के रूप प्रेम पैदा होता है और भक्ति प्रारंभ होती है। भक्ति प्रगाढ़ होने पर आत्मा परमात्मा से एकाकार हो जाता है। मानवता को पुनजीर्वित करना है तो ब्रह्माज्ञान द्वारा ब्रह्मा की अनुभूति करनी होगी। व्यक्ति आत्मिक रूप से जब तक जाग नहीं जाता है, वह सशक्त चरित्र का स्वामी नहीं बन सकता है। मंगलवार को कथा वाचन करते हुए साध्वी विश्वंभरा भारती ने समुद्र मंथन प्रसंग पर चर्चा की। इस दौरान शिक्षा, शिक्षक व गुरु के विभिन्न प्रकारों का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि समुद्र मंथन में निकला विष आखिरकार भगवान शिव ने पीया। भगवान शिव स्कण्ध पुराण में कहते हैं कि जीवन में गुरु को धारण किए बिना कोई मुझे प्रसन्न नहीं कर सकता। किंतु, सोच-समझ कर गुरु बनाने की जरूरत है। सच्चा गुरु भक्तों को भौतिक प्रलोभनों में नहीं डालता है। वो ज्ञान दीक्षा देते समय ही ईश्वर के तत्व स्वरूप का साक्षात्कार करा देते हैं। उन्होंने कहा कि विद्या विनयशीलता सिखाती है। किंतु, आज की शिक्षा पद्धति बच्चों के मनस्थिति को नहीं बदल पाती है। मनुष्य को पश्चिमी संस्कृति छोड़कर धार्मिक संस्कृति अपनानी होगी। कथा समापन के बाद आयोजित संगीतमय आरती में यजमान, शहर के गणमान्य लोग व पदाधिकारियों ने शिरकत की।
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3 जून 2015
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गुरु कृपा से जीवन में आता है प्रकाश : विश्वंभरा
गुरु कृपा से जीवन में आता है प्रकाश : विश्वंभरा
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