विलुप्त हो रहा है लोक संस्कृति - मधेपुरा खबर Madhepura Khabar

 

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11 जून 2015

विलुप्त हो रहा है लोक संस्कृति


समय का पहिया आधुनिकता के रंग में रंगकर इतनी तेजी से घूम रहा है . इसमें कुम्हारों के घूमते चाक किसी भी पल दम तोड़ सकता है . आज कुम्हारों के द्वारा निर्मित मिट्टी के बर्तन और अन्य सामानों की मांग बिल्कुल ही कम हो गयी है . बल्कि उनके बनाए बर्तन पर्व त्योहारों में महज वक्ती जरुरत बनकर रह गए हैं. एक समय था जब कुम्हार जाति के लोग खासकर के दीवाली आने का इन्तजार पूरा साल करते थे . दीवाली में उनके द्वारा निर्मित छोटे-बड़े दीये,डिबिया और अन्य मिट्टी से निर्मित सामान लोगों की पहली जरुरत समझते थे . लेकिन अब बाजार में मिल रहे चारों तरफ बिजली के चाइनिज बल्ब बत्ती से लोग दीवाली मनाते है . जाहिर सी बात है की लोगों की नयी पसंद से कुम्हारों के पुश्तैनी कारोबार को गहरा धक्का लगा है . आज कुम्हार जाति के लोगों के सामने ना केवल उनके कारोबार को बन्द करने की समस्या खड़ी है बल्कि उनके परिवार का जीवन यापन कैसे  होगा यह सवाल उठा  है . सरकार ने भी इन कुम्हारों के लिए आजतक कुछ भी नहीं किया है बेबस, लाचार और मजबूर ये कुम्हार आज भी सपरिवार चाक घुमा रहे हैं आखिर यह करे भी तो क्या करें . सहरसा जिला के कहरा प्रखंड अंतर्गत सुलिन्दाबाद गाँव जहां कुम्हारों के करीब सौ परिवार रहते हैं . उसे तो हर मौसम में इन कुम्हारों के घर चाक घूमते रहते हैं और कोई ना कोई मिट्टी का बर्तन बनता रहता है . लेकिन दीवाली के समय इनके घर के चाक दिन और रात घूमते रहते हैं आमलोगों की तरह दीवाली का पर्व इनके लिए भी बड़ा ख़ास होता है . इस पर्व में मिट्टी के दीये और डिबिया बनाते हैं . कुछ वर्षो पहले तक लोग अपने घरों में कुम्हार के बने दीये से दीवाली मनाया करते थे लेकिन आज अपने घरों में बिजली के चाइनिज बल्ब बत्ती से ही दीवाली मनाया करते है.



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