मधेपुरा : कोविड-19 महामारी के कारण देश में लॉकडाउन लागू है। लोग घरों में कैद है। जिससे भारत के अलावे अन्य देशों की भी अर्थव्यवस्था गर्त में चली गयी है। इससे देश में आर्थिक प्रभाव ही नहीं बल्कि शैक्षिक प्रणालियां को काफी प्रभावित किया है। आज उन विद्धानों की बात भी विपरीत नजर आ रही है, जो ढ़ाई दशक पहले 1997 में ब्रिटेन की वरिष्ठ अर्थशास्त्री फ्रैंसिस कैर्नकोर्स ने 'द डेथ ऑफ़ डिस्टेंस' सिंद्धांत दिया था।
जिसमें कहा गया कि 'दुनियां की दूरियां का अंत हो गया है।" लेकिन उन्होंने शायद इस तरह के वैश्विक महामारी जैसे किसी परिदृश्य की कल्पना नहीं की होगी, जिससे आज पूरी दुनियां एक साथ जूझ रही है। इससे आज लोग घरों में कैद है। जिससे आर्थिक सामाजिक शैक्षिक प्रणालियां चौपट हो गयी है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 193 देशों में संपूर्ण देश को बंद और केवल पांच देशों ने स्थानीय शहरों को बंद किया है। जिससे विश्व की लगभग 99.9 प्रतिशत जनसंख्या प्रभावित हुई। भारत चीन के बाद विश्व की दूसरी सबसे बड़ी स्कूल प्रणाली तथा अमेरिका के बाद ई-लर्निंग का दूसरा सबसे बड़ा बाजार है।
ऐसे में शिक्षा और रोजगार जैसे समस्या विद्यार्थी का भविष्य अधर में लटक गया है। वर्तमान सरकार द्वारा दिशा-निर्देश पर ऑनलाइन कक्षा और शिक्षा की सुविधा जैसे छात्र फायदा तो उठा रहे हैं, लेकिन इससे उनकी आंतरिक शिक्षा मजबूत नहीं हो पाएगी। बड़ी संख्या ऐसे छात्र देश में हैं, जिसके पास लैपटॉप, स्मार्टफोन अन्य ऑनलाइन उपकरण उपलब्ध नहीं है।
दूसरी बात, ऐसे क्षेत्र जहां इंटरनेट सुविधा बहुत कम होने से छात्रों ने इस तरह की पढ़ाई पूर्णत संभव नहीं, एक बड़ा तबका गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहा है। ऐसी स्थिति में उसके लिए ऑनलाइन कक्षा और साधन बहुत कम उपलब्ध होते हैं। अब आय के साधन बंद हो गए हैं, जिससे गरीब परिवार के बच्चे गरीबी के कारण शिक्षा से वंचित रह सकते हैं। ऑनलाइन शिक्षा में आंतरिक शिक्षा संभव नहीं है। ऐसे में यह सिस्टम को एक सीमा में बांधने का काम करती। कोविड-19 भविष्य में इतना प्रचंड रूप से आतंक मचाएगा किसी देश ने शायद नहीं सोचा होगा। यूनेस्को के एक सर्वे के अनुसार, भारत में अनुमानित लगभग 32 करोड़ युवा हैं। जिसमे 16.19 कराेड़ लड़के एवं 15.81 लड़कियां शामिल है।
वैश्विक स्तर पर देखें तो 157 करोड़ छात्रों की शिक्षा प्रभावित हुई है। जो विभिन्न स्तरों पर दाखिला लेने वाले छात्रों का 91.3 प्रतिशत है। इस तरह स्पष्ट है कि यह महामारी इस सदी की सबसे बड़ी समस्या या काल के रूप में सामने आया। इस समय समाज की बुनियादी सबल शिक्षा प्रणाली मानी जाती है। पाठ्यकर्मों के अनियमित होने से आर्थिक हितों को नुकसान पहुंचा है। कोविड-19 के कारण वैश्विक गरीबी में 50 आधार अंक की गिरावट की आशंका जताई है। स्पष्ट है कि 100 आधार अंक एक प्रतिशत के बराबर होता है, तो वैश्विक जीडीपी ने आधे प्रतिशत की कमी होने की संभावना साफ है। इससे शिक्षा क्षेत्र को भी बड़ा झटका लगा है। यह विपदा किसी देश की रीढ़ समझी जानेवाली अर्थव्यवस्था की शिक्षा, रक्षा, स्वास्थ्य सभी पर बुरी तरह से प्रभावित कर दिया है।
इस प्रकार कोविड-19 महामारी के कारण इतिहास में अभूतपूर्व है। सरकारें स्थिति से निपटने की कोशिस कर रही है। इससे दिहाड़ी मजदूर, संगठित व असंगठित क्षेत्र और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्र खासकर के उच्च संस्थान विश्वविद्यालय जैसे जहां पर उच्च शिक्षा पोस्ट ग्रेजुएट, शोध कर रहे छात्र जो बांकि समय अल्परोजगार जीवन जीने के साथ-साथ उनकी मानव पूंजी सृजन अपनी भावी आशा को सामंजस्य स्थापित करने निर्भर मात्र है। आज ऐसे स्थिति भविष्य खतरे से कम नहीं। यहां आबादी का एक बड़ा हिस्सा आजीविका के मसलों का सामना कर रहा है। एक ओर बेरोजगारी दर आसमान छू रही है।
ऐसे हालात में उनकी आर्थिक मदद परिवार कर पाएंगे यह उम्मीद करना निरर्थक है, यदि इसे अनियंत्रित छोड़ दें, तो शायद इससे उनकी पढ़ाई 'ड्रॉप आउट' की समस्या उत्पन्न हो सकती है। बिहार की बात करें तो यहां छात्रों की और दयनीय स्थिति उत्पन्न हो जायेगी। बिहार में अधिक संख्या में असमान पृष्ठभूमि से बच्चे पढ़ने आते है। उच्च शिक्षा की बात करें तो बिहार में आज शिक्षा व्यवस्था का हाल यह है कि आधा दर्जन विश्वविद्यालयों में विभिन्न सत्रों की परीक्षा पहले से कई सालों से लटकी है तो ऐसे हालात में छात्रों की भविष्य और अधर में लटकी। इसलिए सरकार को अब चाहिए कि वो स्कूल, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय छात्रों को बुनियादी जरूरतों को सुनिश्चित करने तत्परता के साथ आर्थिक सहायता हेतु कदम बढ़ाएं। ताकि शिक्षण प्रक्रिया ड्राप आउट में कमी तथा मानव पूंजी निर्माण में वृद्धि हो सकें।
अमरेश कुमार 'अमर'
शोधार्थी, अर्थशास्त्र विभाग, बीएनएमयू, मधेपुरा









