मधेपुरा: प्रोफेसर इंद्रनारायण यादव एक कर्तव्यनिष्ठ हिंदी प्राचार्य, कुशल एवं कर्मशील प्रशासक और सहृदय अभिभावक के रूप में कोशी क्षेत्र मे समादृत हैं. उनका असामयिक देहावसान से बीएन मंडल विश्वविद्यालय मधेपुरा परिवार के साथ हिंदी विभाग के प्राध्यापक-कर्मी मर्माहत और शोकाकुुल हैं.
हम उनकी पुण्यात्मा की परम शांति के लिए ईश्वर से अंतस्तल से प्रार्थना करते है और उनके परिजनों के प्रति हार्दिक संवेदना व्यक्त करते हैं. हम उनकी पीड़ा में उनके साथ हैं. प्रोफेसर यादव की शिक्षक सेवा की शुरुआत बी एन भी कालेज मधेपुरा से होती हैं जहां शिक्षक, प्रभारी प्राचार्य, और अन्य प्रशासनिक पदों पर कार्य करते हुए बी एन मंडल विश्वविद्यालय मधेपुरा के हिंदी विभाग में अध्यक्ष पद पर दक्षतापूर्ण कर्तव्य निर्वहन करते हैं और सेवा निवृत्ति प्राप्त करते हैं.
इंद्रनारायण बाबू आचार्य के साथ संत -साहित्य के ज्ञाता के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं और संतत्व उनके आचरण एवं व्यवहार में भी प्रदर्शित होता है. प्रोफेसर यादव की रचनाधर्मिता और आलोचकीय प्रतिभा से हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि हुई है और हम हिंदी सेवी कृतज्ञ और आभारी हैं. 'गद्य की अधुनातन विधाएं' उनकी महत्वपूर्ण आलोचनात्मक कृति है और उनके अनेक शोध आलेख राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं प्रकाशित हैं.
हिंदी विभाग में अनेक राष्ट्रीय संगोष्ठियों की अध्यक्षता करना हमारे लिए गौरव की बात है।हिंदी विभाग की उन्नति और समृद्धि में अपूर्व योग के लिए विश्वविद्यालय ऋणी है.
(रिपोर्ट:- ईमेल)
पब्लिसिटी के लिए नहीं पब्लिक के लिए काम करना ही पत्रकारिता है....
हम उनकी पुण्यात्मा की परम शांति के लिए ईश्वर से अंतस्तल से प्रार्थना करते है और उनके परिजनों के प्रति हार्दिक संवेदना व्यक्त करते हैं. हम उनकी पीड़ा में उनके साथ हैं. प्रोफेसर यादव की शिक्षक सेवा की शुरुआत बी एन भी कालेज मधेपुरा से होती हैं जहां शिक्षक, प्रभारी प्राचार्य, और अन्य प्रशासनिक पदों पर कार्य करते हुए बी एन मंडल विश्वविद्यालय मधेपुरा के हिंदी विभाग में अध्यक्ष पद पर दक्षतापूर्ण कर्तव्य निर्वहन करते हैं और सेवा निवृत्ति प्राप्त करते हैं.
इंद्रनारायण बाबू आचार्य के साथ संत -साहित्य के ज्ञाता के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं और संतत्व उनके आचरण एवं व्यवहार में भी प्रदर्शित होता है. प्रोफेसर यादव की रचनाधर्मिता और आलोचकीय प्रतिभा से हिंदी साहित्य की श्रीवृद्धि हुई है और हम हिंदी सेवी कृतज्ञ और आभारी हैं. 'गद्य की अधुनातन विधाएं' उनकी महत्वपूर्ण आलोचनात्मक कृति है और उनके अनेक शोध आलेख राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं प्रकाशित हैं.
हिंदी विभाग में अनेक राष्ट्रीय संगोष्ठियों की अध्यक्षता करना हमारे लिए गौरव की बात है।हिंदी विभाग की उन्नति और समृद्धि में अपूर्व योग के लिए विश्वविद्यालय ऋणी है.
(रिपोर्ट:- ईमेल)
पब्लिसिटी के लिए नहीं पब्लिक के लिए काम करना ही पत्रकारिता है....









