मधेपुरा: वाम छात्र संगठन स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया(एसएफआई) की बीएनएमयू इकाई के द्वारा देश के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ राजेन्द्र प्रसाद की 140 वीं जयंती उनके तैलीय चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर मनाई. मौके पर एसएफआई के बीएनएमयू प्रभारी डॉ. सारंग तनय ने कहा कि भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष, भारत के प्रथम राष्ट्रपति, जिनके राष्ट्रप्रेम,ज्ञान, सादगी व सच्चाई ने आदर्श का प्रतिमान गढ़ा है. डॉ. राजेंद्र बाबू भारतीय राजनीति के एक ऐसे सितारे हैं, जिसकी चमक कभी कम नहीं होगी.उनका जन्म 3 दिसम्बर 1884 को बिहार के सिवान जिले के जीरादेई में हुआ था. 18 साल की उम्र में राजेंद्र प्रसाद ने कोलकाता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया. उन्होंने कहा कि विद्वता और सादगी की प्रतिमूर्ति डॉ राजेंद्र प्रसाद देश के इकलौते राष्ट्रपति हैं जो लगातार दो बार राष्ट्रपति बने. राजेन्द्र बाबू विद्वता, सादगी और ईमानदारी के मिशाल थे. डॉ. सारंग तनय ने कहा कि पढ़ाई-लिखाई में मेधावी होने की वजह से एक परीक्षा में उनके परीक्षक को उनकी उत्तरपुस्तिका पर लिखना पड़ा था कि "दी एग्जामिनी इज बेटर देन एग्जामिनर".. यानि परीक्षार्थि परीक्षक से ज्यादा तेज है. वे विपुल प्रतिभा के धनी थे. सम्पूर्ण भारत में डॉ राजेंद्र प्रसाद काफी लोकप्रिय थे, इसका प्रमाण उन्हें 'राजेंद्र बाबू' एवं 'देशरत्न' कह कर बुलाए जाने से मिलता है. उन्होंने भारतीय संविधान सभा के निर्माण प्रक्रिया की सम्पूर्ण देखभाल की, जिसके आधार पर भारत एक प्रभुत्व सम्पन्न लोकतांत्रिक गणराज्य बना. वे संविधान सभा के पहले स्थायी अध्यक्ष बने. उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में अपना अमूल्य योगदान देने वाले देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद की जयंती पर उन्हें नमन, आजादी से पहले स्वतंत्रता आंदोलन के लिए और बाद में राष्ट्रपति के रूप में उन्होंने अपना जीवन देश और समाज के लिए समर्पित किया.
डॉ. सारंग तनय ने कहा कि डॉ राजेन्द्र प्रसाद गाँधीजी से बेहद प्रभावित थे। वे उन भारतीय नेताओं में से थे जिन्होंने भारतीय स्वंतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने कहा कि डॉ राजेन्द्र प्रसाद धर्म, वेदांत, साहित्य-संस्कृति, शिक्षा, इतिहास, राजनीति, भाषा आदि विषयों पर वे हर स्तर पर अपने विचार व्यक्त करते थे. वे सादा जीवन, उच्च विचार सिद्धांत को अपनाने वाले थे. राजेंद्र प्रसाद अपनी वाणी में हमेशा ही अमृत बनाये रखते थे. राष्ट्रपति पद से अवकाश ले लेने के बाद ही उन्हें भारत सरकार की ओर से सर्वोच्च नागरिक सम्मान "भारत रत्न" से नवाजा गया. राजेंद्र प्रसाद की वेशभूषा बड़ी सरल थी. उनको देखकर पता ही नहीं चलता था कि वे इतने प्रतिभा संपन्न और उच्च व्यक्तित्व वाले सज्जन हैं, देखने में वे सामान्य किसान जैसे लगते थे. अपने जीवन के आखिरी महीने बिताने के लिए उन्होंने पटना के सदाकत आश्रम को चुना. 28 फरवरी 1963 को वे हम सब को छोड़ कर चले गए. मौके पर विद्या कुमारी, अंशु कुमारी, शिवानी कुमारी, साक्षी कुमारी, खुशबू कुमारी, नेहा कुमारी, मनीषा कुमारी, नेहा कुमारी, तन्नूश्री, वर्षा कुमारी आदि मौजूद रहे.
(रिपोर्ट:- ईमेल)
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