मधेपुरा: हमारे लोकतंत्र की नींव को संभालने वाली आशा. जी हां! मैं उसी आशा कार्यकर्ता की बात कर रहा हूं जो "स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय" के अंतर्गत ज़मीनी/ग्रामीण स्तर पर लोगों के स्वास्थ्य संबंधित कार्य करती हैै. जिसे अंग्रेजी में Accredited social health activist (ASHA) कहते हैं. ये जमीनी स्तर पर या यूं कहें तो भारतीय लोकतंत्र की नींव के स्वास्थ्य को संभालने वाली महिला सेना है. आशा गांव के स्वास्थ्य विकास हेतु बीमारियों से बचाव तथा स्वास्थ्यवर्धक कार्य करती है. आशा स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र के माध्यम से गरीब महिलाओं को स्वास्थ्य संबंधित सेवाएं देती है. भारत की सभी "राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन योजना" आशा के माध्यम से ही सफल हो पाता है.
इसलिए आशा को एक सामान्य सरकारी कर्मचारी के तौर पर नहीं देखकर एक 'कर्मठ और सक्रिय' स्वास्थ्य कर्ता के रूप में देखना चाहिए. किसी भी ग्रामीण क्षेत्र में अगर किसी को स्वास्थ्य संबंधित समस्या होती है तो वह सबसे पहले आशा दीदी के पास आस लगाए जाता है. हमारे शब्दों में अगर आप पूछो तो जिसे मैंने प्रथम वाक्य में महिलाओं की सेना/लोकतंत्र की स्वास्थ्य सेना कहा है! यही असली भारत माता भी है. क्योंकि एक माता ही एक साथ कई कई कामों को बिना किसी लोभ के कर सकती है (आज के जमाने में तो फ्री में एक घंटा भी नहीं मिलता) और इन आशा दीदी को इन कामों के बदले इतने पैसे मिलते हैं कि वह रिक्शा भाड़ा मैं भी कम पड़ जाए. इसके बावजूद भी ये पैसे समय पर नहीं मिल पाते.
पिछले दो-तीन महीनों से हमारा कार्य आशा दीदी के साथ (फाईलेरिया उन्मूलन अभियान को लेकर) थोड़ा ज्यादा ही था तो इस दरमियान हमें उनके कार्यों को देखने और जानने का मौका मिला. बीते कोविड-19 (कोरोना) महामारी में अगर आज हम टीकाकरण के एक सौ करोड़ के लक्ष्य को पार कर पाए हैं तो इनमें भी इन दीदी का सबसे बड़ा हाथ रहा है. आज अगर हम पोलियो पर पकड़ पा सके हैं तो उनमें इन दीदी का सबसे ज्यादा ज़मीनी सपोर्ट रहा है. इस तरह की कोई भी टीकाकरण अभियान हो या उन्मूलन अभियान उसमें आशा दीदी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती है. इस कोविड 19 महामारी में भी ये दीदी घर-घर जाकर सर्वेक्षण, कॉन्ट्रैक्ट-ट्रैकिंग, जागरूकता अभियान चलाने और कई गतिविधियों को अंजाम दी हैं.
अभी वर्तमान में (सितंबर-अक्टूबर 2021) भारत सरकार के "फाईलेरिया उन्मूलन अभियान" को असल में इन्होंने ही सफल बनाया. हमारी आशा दीदी इन कार्यों के अलावा और भी कई का काम साथ साथ करती है जैसे:- कुपोषित बच्चे, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के स्वास्थ्य संबंधित जानकारी रखती है. वह प्रसव के समय गर्भवती महिलाओं के साथ स्वास्थ्य संस्था में जाती है तथा उसके साथ मदद के लिए कम से कम 2 दिन तक वहां रूकती है. (इससे मातृत्व और शिशु मृत्यु दर में बहुत कमी आई है.) गांव में स्वच्छता, साफ पानी, सुरक्षित मातृत्व, बच्चों का स्वास्थ्य, परिवार कल्याण एवं पोषण आदि के बारे में जागरूकता तथा ग्राम वासियों को इसे हासिल करने में आशा की अहम भूमिका रहती है.
आशा है तो गांव में आस है!
नहीं तो सब कुछ खाक है!!
(आलेख:- रोशन वत्स)








